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Narak Chaturdashi

Narak Chaturdashi

Category: Festival
नरक चतुर्दशी का पर्व धनतेरस के अगले दिन यानि छोटी दीपावली को मनाया जाता है। नरक चतुर्दशी का सनातन धर्म में विशेष महत्व है। इस पर्व को भारतीय समाज में रूप चतुर्दशी, नरक चौदस, रूप चौदस और काली चौदस के नाम से भी जाना जाता है। इस तिथि के दिन यम के नाम से दीपदान की भी परंपरा है। 

भारत की सनातन और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधि विधान से श्री हरि भगवान विष्णु की पूजा अर्चना करने से सौंदर्य की प्राप्ति होती है। नरक चतुर्दशी को लेकर अनेक प्रकार की मान्यताएं हैं। नरक शब्द का अभिप्राय मलिनता से भी है, मलिनता को दूर करना ही इस पर्व को मनाने का मुख्य लक्ष्य है। यह मलिनता शारीरिक, मानसिक और आत्मिक सभी विभागों से दूर करनी होती है। हर स्थान से मलिन यानी अनुपयोगी चीजों को दूर करना ही इसका उद्देश्य है फिर चाहे वह घर हो या आपका अपना अंतर्मन। 

परंपरा के अनुसार चतुर्दशी यानी नरक चौदस के दिन लक्ष्मी जी सरसों के तेल में निवास करती हैं, इसलिए ऐसा माना जाता है कि इस दिन शरीर में सरसों का तेल लगाने से आर्थिक रूप से संपन्नता आती है। जिन लोगों को आर्थिक रूप से परेशानियों का सामना करना पड रहा हो उनको इस दिन सरसों का तेल जरूर लगाना चाहिए। नरक चौदस के दिन उबटन लगाने का भी प्रचलन है, उबटन लगाने के बाद गुनगुने पानी से स्नान कर श्रृंगार करने का भी काफी महत्व है। 

चतुर्दशी के दिन अभ्यंग स्नान, सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि जो लोग इस दिन अभ्यंग स्नान करते हैं, वे नरक में जाने से बच सकते हैं। अभ्यंग स्नान के दौरान उबटन के लिए तिल के तेल का प्रयोग करना चाहिए। अभ्यंग स्नान हमेशा चंद्रोदय के दौरान किया जाता है लेकिन सूर्योदय से पहले पूर्ण हो जाना चाहिए। 

इस दिन 6 देवी देवताओं यमराज, श्री कृष्ण, काली माता, भगवान शिव, हनुमान जी और वामन भगवान की पूजा का विधान है। इस दिन घर के ईशान कोण में इन सभी देवी देवताओं की प्रतिमा स्थापित कर विधि विधान से पूजा अर्चना करनी चाहिए। वहीं यह मान्यता भी है कि इस दिन मां काली की पूजा अर्चना करने से शत्रुओं पर विजय की प्राप्ति होती है। 

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नरक चतुर्दशी के दिन शाम के समय यमराज की पूजा करने से नरक की यातनाओं और अकाल मृत्यु का भय खत्म होता है।  नरक चौदस का पावन पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चौदस को मनाया जाता है। 

नरक चतुर्दशी के दिन सूर्योदय से पहले स्नान करके साफ और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। सभी देवी देवताओं के सामने धूप दीप जलाएं, कुमकुम का तिलक लगाएं और मंत्रो का जाप करें। इस दिन यम के लिए आटे का चौमुखा दीपक बनाकर भी घर के मुख्य द्वार पर जलाया जाता है। घर की महिलाएं रात के समय दीपक में तिल का तेल डालकर चार बत्तियां जलाती हैं। इस दिन रात के समय विधि-विधान से पूजा करने के बाद दीपक जलाकर दक्षिण दिशा की ओर मुख कर रखते हैं, और ‘मृत्युनां दण्डपाशाभ्यां कालेन श्यामया सह। त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम्’ मंत्र का जाप करते हुए यम का पूजन करते हैं। 

इस पूजन से घर में सकारात्मकता उत्पन्न होती है। ऐसे में शाम के समय यमदेव की पूजा करें और चौखट के दोनों ओर दीप जलाकर रखें। इस दिन यमराज की पूजा अर्चना करने से पापों का नाश होता है। 

नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली को प्रातःकाल हाथी को गन्ना या मीठा खिलाने से जीवन में चल रही परेशानियों से छुटकारा मिलता है। 

यूं तो नरक चौदस पर दीप दान करने और साफ-सफाई रखने से घर में खुशहाली आती है। मगर इस दिन नीचे दिए गए कुछ कामों को करने से बचना भी चाहिए अन्यथा साल भर घर में दरिद्रता का वास भी हो सकता है।    

- नरक चतुर्दशी के दिन जिन लोगों के पिता जीवित हैं वह भूलकर भी तिल से यम देव का तर्पण न करें। ऐसा करने से परिवार पर संकट आने का खतरा रहता है। 

- नरक चतुर्दशी के दिन जीव हत्या नहीं करनी चाहिए। चूंकि इस दिन यमराज की पूजा की जाती है ऐसे में हत्या करने से पाप लगेगा। 

- नरक चतुर्दशी के दिन घर की दक्षिण दिशा को गंदा नहीं रखना चाहिए। क्योंकि इसे यम का कोना माना जाता है, इससे आपके पितर नाराज हो सकते हैं।

- नरक चतुर्दशी के दिन तेल का दान बिल्कुल भी न करें। क्योंकि ऐसा करने से घर में लक्ष्मी नहीं टिकती है। 

- नरक चतुर्दशी के दिन कभी देर से सोकर नहीं उठना चाहिए। ऐसा करने से भाग्य हमेशा के लिए सो जाता है। 

यह पर्व देश के विभिन्न भागों में मनाया जाता है। नरक चतुर्दशी के दिन भगवान श्री कृष्ण और सत्यभागा ने नरकासुर नामक राक्षस का वध किया था इसलिए इस दिन को नरक चतुर्दशी भी कहते हैं। नरकासुर ने वैदिक देवी अतिथि के सम्राज को हड़प लिया था तथा उसने बहुत सी महिलाओं को प्रताड़ित भी किया था। फिर श्री कृष्ण ने सोलह हजार एक सौ कन्याओं को नरकासुर से मुक्त कर उन्हें सम्मान प्रदान किया था। 

कुछ स्थानों पर छोटी दिवाली के मौके पर नरकासुर का पुतला दहन भी किया जाता है। वहीं भारत उत्तर पूर्व क्षेत्र के लोगों का मानना है कि नरकासुर का वध काली माँ ने किया था। यही कारण है कि छोटी दिवाली के दिन काली मां की पूजा भी की जाती है। 

नरक चतुर्दशी के संदर्भ में एक अन्य कथा यह भी प्रचलित है कि रन्ति देव नामक एक पुण्यात्मा और धर्मात्मा राजा थे। उन्होंने अनजाने में भी कोई पाप नहीं किया था लेकिन जब मृत्यु का समय आया तो उनके सामने यमदूत आ खड़े हुए। यमदूतों को देख राजा अचंभित होकर बोले मैंने तो कभी कोई पाप कर्म नहीं किया फिर आप लोग मुझे लेने क्यों आए हो। आप मुझ पर कृपा करें और बताएं कि मेरे किस अपराध के कारण मुझे नरक जाना पड़ रहा है। यमदूत ने कहा हे राजन् एक बार आपके द्वार से एक भूखा ब्राह्मण वापस लौट गया था, यह उसी पाप का फल है। 

यमदूत की यह बात सुनकर राजा ने कहा कि मैं आपसे विनती करता हूँ कि मुझे वर्ष का समय दे दे। यमदूतों ने राजा को एक वर्ष का समय दे दिया। राजा अपनी परेशानी लेकर ऋषियों के पास पहुंचा और उन्हें सब वृतान्त कहकर उनसे इस पाप से मुक्ति का पूछा। ऋषि बोले हे राजन् आप कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि का व्रत करें और ब्राह्मणों को भोजन करवा कर उनसे अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करें। राजा ने वैसा ही किया जिससे उन्हें पापों से मुक्ति मिली और स्वर्ग में स्थान प्राप्त हुआ। 

वैसे कोई भी पर्व हो या त्यौहार हो उसका मूल उद्देश्य सकारात्मक भाव के साथ ईश्वर से प्रार्थना करना होता है, उनकी कृपा प्राप्त करना होता है। 

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