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Mahalaya

Mahalaya

Category: Festival
महालय का भी हिंदुओं के लिए अति महत्व है। शास्त्रों के अनुसार, हमारे पूर्वज या पितर, पितृ पक्ष में धरती पर निवास करते हैं। पितृ ऋण उतारने के लिए ही पितृ पक्ष में श्राद्ध कर्म किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस अवधि में उनको जो कुछ भी श्रद्धा से अर्पित किया जाता है वे उसे हर्षपूर्वक स्वीकार करते हैं। इस दिन टोरपोन (प्रसाद) का अनुष्ठान किया जाता है। लोग गंगा नदी के तट धोती पहने आते हैं और अपने मृत पूर्वजों की प्रार्थना करते हैं और पिंड-दान करते हैं। पितृपक्ष पक्ष को महालय अथवा कनागत भी कहा जाता है। 

महालया के दिन पितरों को अंतिम विदाई दी जाती है। पितरों को दूध, तिल, कुशा, पुष्प और गंध मिश्रित जल से तृप्त किया जाता है। इस दिन पितरों की पसंद का भोजन बनाया जाता है और विभिन्न स्थानों पर प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है। इसके अलावा इसका पहला हिस्सा गाय को, दूसरा देवताओं को, तीसरा हिस्सा कौवे को, चौथा हिस्सा कुत्ते को और पांचवा हिस्सा चीटियों को दिया जाता है। वहीं जल से तर्पण करने से पितरों की प्यास बूझती है।

महालय 'देवी-पक्ष' की शुरुआत और 'पित्र-पक्ष' (श्राद्ध या शोक अवधि) के अंत का प्रतीक है। ऐसा कहा जाता है कि महालया को धरती पर मां दुर्गा का आगमन होता है और (अपने पैतृक घर पर और अपने बच्चों के साथ) यात्रा करती है, अर्थात 'देवी-पक्ष' का यह पहले दिन है। चूंकि देवी दुर्गा की परंपरागत रूप से वसंत-समय पर पूजा की जाती है, इसलिए इस शारदीय (शरद ऋतु) त्योहार को अकालबोधन (देवी का असामयिक रूप से आह्वान) भी कहा जाता है।

महालया के अलगे दिन से नवरात्र और दुर्गा पूजा शुरू हो जाती है। नवरात्र में दुर्गा पूजा के सभी रूपों का विशेष महत्व होता है। मां दुर्गा की पूजा सभी श्रद्धालू बड़े ही श्रद्धा भाव के साथ करते हैं। महालया से अगले दिन कलश स्थापना के साथ शारदीय नवरात्रि प्रारंभ हो जाती है। 

पश्चिम बंगाल के लोगों के लिए महालया का विशेष महत्‍व है और वे लोग साल भर इसी दिन की प्रतीक्षा करते हैं। महालया के साथ ही जहां एक ओर श्राद्ध खत्‍म हो जाते हैं, वहीं मान्‍यता के अनुसार, इसी दिन मां दुर्गा कैलाश पर्वत से धरती पर आगमन करती हैं और अगले 10 दिनों तक यहीं रहती हैं। 

हिन्दू शास्त्रों में, महालया और सर्व पितृ अमावस्या को एक ही दिन मनाया जाता है और इसके अगले दिन आश्विन माह के शुक्ल पक्ष में दुर्गापूजा होती है। महालया के दिन ही मूर्तिकार मां दुर्गा की प्रतिमाओं की आंखें तैयार करते हैं यानी दुर्गा प्रतिमाओं के नेत्र बनाए जाते हैं। सर्व पितृ अमावस्या और महालया के बाद ही मां दुर्गा की मूर्तियों को अंतिम रूप दिया जाता है। दुर्गा पूजा में मां दुर्गा की प्रतिमा का विशेष महत्व है और यह पंडालों की शोभा बढ़ाती हैं। 

आज के दौर में भी महालय की महत्ता, बंगाली समुदाय के लोगों के दुर्गा माँ के प्रति प्रेम और स्नेह से समझी जा सकती है। इसी प्रकार से मराठी समुदाय के लोग भी गणेश पूजा को बहुत धूम धाम और स्नेह के साथ मनाते हैं। दुर्गा पूजा साल की नयी शुरुआत करने का लोगों में उत्साह लेकर आता है और लोग अपने अंदर के महिषासुर को मार कर, सभी गिले शिकवे भूल कर, प्रेम पूर्वक एक दूसरे के साथ माँ दुर्गा के सम्मुख इस त्योहार को मनाते हैं। इससे अच्छा और शुभ समय और संदेश क्या हो सकता है। 

Mahalaya Dates

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