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Dhantrayodashi

Dhantrayodashi

Category: Festival
धनतेरस, जिसे धन त्रयोदशी या धन्वंतरि त्रयोदशी के रूप में भी जाना जाता है, विक्रम संवत पंचांग में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष के तेरहवें चंद्र दिवस पर धनतेरस के रूप में मनाया जाता है। यह दीवाली के त्योहार का पहला दिन होता है।  

हिन्दू पुराणों के अनुसार, इस दिन भगवान धन्वंतरि का जन्म हुआ था। धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की पूजा होती है। भगवान धन्वंतरि, समुद्र मंथन के दौरान समुद्र से उत्पन्न हुए थे, उनके एक हाथ में अमृत से भरा कलश था और दूसरे हाथ में आयुर्वेद का पवित्र ग्रंथ था। वे आयुर्वेद के देवता हैं, जिन्होंने मानव जाति की भलाई के लिए संसार को आयुर्वेद का ज्ञान दिया और बीमारयों के कष्ट से छुटकारा पाने में संसार की मदद की। धन्वंतरि को देवताओं का वैद्य भी माना जाता है। 

धनतेरस - एक कथा -

एक प्राचीन किंवदंती के अनुसार, एक बार हेम नामक राजा की पत्नी ने जब एक पुत्र को जन्म दिया, तो ज्योतिषियों ने नक्षत्र गणना करके बताया कि यह बालक जब भी विवाह करेगा, उसके चार दिन बाद ही मर जाएगा। यह जानकर उस राजा ने बालक को यमुना तट की एक गुफा में ब्रह्मचारी के रूप में रखकर बड़ा किया। इसी तरह सोलह वर्ष बीत गए। 

एक दिन जब महाराजा हंस की युवा पुत्री यमुना तट पर घूम रही थी, तो उस ब्रह्मचारी युवक ने मोहित होकर उससे गंधर्व विवाह कर लिया। जब राजकुमारी को  उसकी कुंडली में, शादी के चौथे दिन, सांप के काटने से उसकी मृत्यु की भविष्यवाणी का पता चला। तो पहले तो वह बहुत चिंतित हुई, मगर फिर उसने इस समस्या का साधु महात्माओं से हल निकलवाया जिसके अनुसार यदि वह ब्रह्मचारी राजकुमार सारी रात जागता रहेगा तो उसे सांप के रुप में यमदूत काट नहीं पाएगा। 

फिर शादी के चौथे दिन पर, उस राजकुमारी, नव विवाहित पत्नी ने राजकुमार को रात्रि में ना सोने के लिए बाध्य किया। उसने शयनकक्ष के प्रवेश द्वार पर अपने सारे गहने और ढेर सारे सोने और चाँदी के सिक्के बिछा दिए। सारे भवन में बहुत से दीपक जला दिए। फिर उसने कहानियां सुनाना प्रारंभ कर दिया, जिससे राजकुमार को नींद न आए। उसने अपने पति को नींद से बचाने के लिए गीत गाने शुरु कर दिए। जब मृत्यु के देवता का यमदूत, एक सर्प के रुप में राजकुमार के शयनकक्ष में दरवाजे पर पहुंचा, तो उसकी आँखें चौंधिया गईं। दीपकों के प्रकाश और आभूषणों की चमक से, वह लगभग अंधा हो गया। 

यमदूत राजकुमार के कक्ष में तब तक प्रवेश नहीं कर सकता था, जब तक कि वह सो न जाए। इसलिए वह सोने के सिक्कों के ढेर के ऊपर चढ़ गया और पूरी रात वहाँ बैठकर कहानियाँ और गीत सुनता रहा। इसी तरह सुबह हो गई और उसके राजकुमार को डसने वाले, काल की घड़ी, टल चुकी थी इसलिए वह चुपचाप चला गया। इस प्रकार, उस युवा राजकुमार को उसकी नई दुल्हन ने, चतुराई से मौत के चंगुल से बचा लिया। वह दिन धनतेरस का था, इसलिए तभी से यह दिन यमराज के प्रकोप से बचने के रूप में मनाया जाने लगा। 

धनतेरस पर सायंकाल को यम देवता के निमित्त घर की दक्षिण दिशा में दीपक जला कर रखा जाता है। ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से अकाल मृत्यु से रक्षा होती है और पूरा परिवार स्वस्थ रहता है।

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