» श्री कृष्ण का धर्म पथ सुझाव

हमें अपने धर्म के पथ से कभी भी विचलित नहीं होना चाहिए। चाहे कितनी भी विषम परिस्थिति ही क्यों न आ जाए। जो अपने धर्म के पथ पर चलता है सफलता उसके कदम चूमती है। विषम परिस्थियों मे भी सत्य का साथ ना छोड़ने वाले और परिस्थियों का डटकर सामना करने वाले जनमानस का जीवन ही सही मायनों मे एक सफल और उच्च जीवन की परिभाषा है। श्री कृष्ण ने अर्जुन को धर्म के पथ पर चलने की ओर मार्गदर्शन दिया था।

श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को धर्म पथ का सुझाव श्री कृष्ण निम्न पंक्तियों के द्वारा देते हैं :

भीषण भव-रण मध्य एक तृण-मात्र हूं मैं अति साधारण।

लीजे अपनी चरण-शरण, हे अधम-उधारण बिनु कारण॥

 

माया-आकर्षण से कीजे, रक्षण कृष्ण तरण-तारण।

क्षम-मम-दूषण, त्रिभुवन-भूषण, दीनबंधु, प्रभु दुख-हारण॥

 

होय निवारण, मोह-आवरण, ज्ञान-जागरण हो तत्क्षण।

करूं स्मरण, दर्शन प्रतिक्षण, कण-कण बन जाए दर्पण॥

 

दैन्य हरण कर प्रेम संचरण, कर दूं मैं मैं-पन अर्पण।

पाप क्षरण कर, जन्म-मरण हर, पूर्ण करो प्रभु अपना प्रण॥

 

टेर श्रवण कर, मुझे ग्रहण कर, नर बन जाए नारायण।

परम विलक्षण और असाधारण गति पा जाए यह तृण॥

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