» ब्रज भाषा में बाल कृष्ण लीला की कविता
ब्रज-भाषा में बाल कृष्ण लीला की कविता निम्नलिखित है -

कंस ने जब देवकी की सप्तम संतान कूँ मारो,

छूट कंस-करों सूं ऊने जोगमाया रूप उभारो !

उड़ आकाश में चीखके ऊने कंस कूँ ताना मारो,

अरे मूढ़ तूं भ्रम में है गोकुल में नन्द ने, तेरो काल संभारो !

कुपित कंस ने सुनो जो ऐसो, अपनी भगिनी कूँ पुकारो,

सुन हेला अपने भ्राता को, भगती पूतना आई,

कंस ने ऊकूं पठायो गोकुल, कृष्ण की टोह लगाई,

गोकुल गई पूतना ऊने कृष्ण कूँ खोज निकारो !

घातक-घोल गरल को लेप करो अपने वक्ष-स्थल पर,

पूतना पहुंची सुंदरी बनकें छुपके नन्द-यशोदा घर !

झूले सूं ऊ उठाकें ले गई कृष्ण कूँ वन की ओर,

विषैला स्तन-पान करावन, नन्द के घर मचत  है शोर !

चिपाके के निज छात्ती पै लग गई दूध पिलाने पूतना,

कृष्ण ने अब आरम्भ कियो, पूतना कूँ ही चूसना !

विषैले दूध सहित ऊको सब रक्त पीगयो कृष्णा,

रक्त-क्षीण हो जाने पर भी रह गई उनकी तृष्णा !

खोजते-खोजते आत वहाँ सब ग्वाल-बाल संग-संग,

मरी पड़ीं दानवी कूँ लख, भये सारे ही दंग !

नन्द-यशोदा ने लपक के लियो अपने लालन कूँ गोद,

हाथ-मुहँ  धोकर ऊके, कियो आमोद-प्रमोद !

कुपित कंस पड़ गयो कष्ट में पूतना-वध की सुनके,

बलशाली मल्ल बुलवाए ऊने, एक-एक कूँ चुनके !

षडयंत्र-मंत्रणा करके ऊने, बलराम-कृष्ण कूँ बुलायो,

मल्ल विशाल, मदमस्त करी कूँ लड़ायो अरु मरवायो !

भाग्यो भय से कंस कोप-भवन में तुरत-फुरत ही,

भांप के भय काल-कवल होने की बनत जुगत ही !

कृष्ण-कन्हैया पहुँचत, होत वहां ही विकट-विध्वंस,

गदा-युद्ध में खाकर मार, मारो गयो तुरत ही कंस !

बोल उठत सारे जन-गण, जय जय कन्हैया लाल की,

हाथी देने, घोड़ा देने और देने पालकी !

आगे की अब शेष रहत, कथा महाभारत की,

ऐसी होत कृष्ण की अब आगे की महारत की !

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