» नंदा देवी की राजजात यात्रा का इतिहास

नंदा देवी राजजात दुनिया की सबसे अनूठी, विस्मयकारी और साहसिक यात्रा है. इस यात्रा में उच्च हिमालय की दुर्गम व हिममण्डित पर्वत श्रृंखलाओं, मखमली बुग्यालों का स्वप्न लोक, आलौकिक पर्वतीय उपत्यकाओं और अतुलनीय रूपकुण्ड के दर्शन तो होते ही हैं, इस क्षेत्र की संस्कृति और समाज को जानने समझने का दुर्लभ अवसर भी मिलता है.

हिमालय जैसे दुर्लभ पर्वत से मनुष्य का ऐसा आत्मीय और जीवन्त रिश्ता भी हो सकता है, यह केवल नंदादेवी राजजात में भाग लेकर ही देखा जा सकता है. नंदादेवी की इस राजजात का नेतृत्व एक चार सींग वाला मेंढा करता है, जो खुद राजजात यात्रियों को राजजात के पूर्व निर्धारित मार्ग से 17500 फुट की ऊंचाई लांघता हुआ होमकुंड तक ले जाता है.

नंदा देवी के सम्मान में समूचे हिमालयी क्षेत्र में मन्दिर स्थापित किए गए हैं, जिनमें समय-समय पर मेलों का आयोजन होता रहता है. हिमालय की बेटी होने के कारण इस पर्वतीय भू-भाग को भगवती का मायका भी माना जाता है, वहीं दूसरी ओर शिव से ब्याह होने के चलते हिमालय को ही नंदा का सुसराल भी कहा जाता है. नंदा को मायके से ससुराल के लिए विदाई देने के प्रतीक स्वरूप गढ़वाल में तो नंदा घुंघटी के चरण होमकुण्ड तक एक वृहद यात्रा का आयोजन होता है. नौटी से होमकुण्ड तक की लगभग 280 किमी0 लम्बी पैदल यात्रा नन्दा राजजात के नाम से जानी जाती है.

राजजात की परम्परा कितनी पुरानी है कहा नहीं जा सकता. राजवंश द्वारा इस यात्रा का आयोजन किए जाने के कारण इसे राजजात कहा जाता है. विद्वानों का मानना है कि शंकराचार्य के काल से यह यात्रा प्रारम्भ हुई. इतिहासकार शूरवीर सिंह पंवार के अनुसार, यह पंरम्परा लगभग तेरह सौ वर्ष पुरानी है. नंदा देवी राजजात समिति नौटी इस पंरम्परा को लगभग नवीं शती से मानती आ रही है. ऐतिहासिक विवरणों से ज्ञात होता हैं कि एक यात्रा चैंदहवीं सदी में भी आयोजित की गई थी, लेकिन न जाने किन कारणों से उस यात्रा की पूरी टोली अकाल काल कवलित हुई.

कहा जाता है कि इस अभागी यात्रा का आयोजन जसधवल नाम के किसी राजा ने किया था. एक प्रचलित मान्यता यह भी है कि गढ़वाल के पंवार वंश के सातवें राजा के कार्यकाल में सर्वप्रथम इस यात्रा का आयोजन किया गया था.

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