» Ancestor Worshipping According to Date (तिथि अनुसार पित्र पूजन)

आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पितरों को तृप्त करने का उचित समय है इस कारण इसे पितृपक्ष भी कहते हैं। पंद्रह दिन तक चलने वाले इस पक्ष में लोग अपने पितरों को जल प्रदान करते हैं एवं उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध रखते हैं। कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें अपने पित्रों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती इस समस्या के समाधान के लिए पितृपक्ष में कुछ विशेष तिथियां भी भी होती हैं जिस दिन श्राद्ध करने से हमारे सभी पितृजनों की आत्मा को शांति मिलती है। ये मुख्य तिथियां निमंलिखित हैं-

  • सर्वपितृमोक्ष अमावस्या(27 सितंबर, मंगलवार)- इस तिथि के दिन श्राद्ध करने से सभी परिजनों का श्राद्ध हो जाता है इस तिथि का विधान यह है की यदि किसी कारणवस् परिजनों का श्राद्ध भूल जाये  या चुक जाये तो इस दिन श्राद्ध करने से आप अपने परिजनों को तृप्त कर सकते हैं और अपनी भूल चुक का निवारण कर सकते हैं।
  • चतुर्दशी श्राद्ध(26 सितंबर, सोमवार)- यह तिथि परिवार के उन परिजनों के लिए श्राद्ध करने की उतम तिथि है जिनकी मृत्यु आकस्मिक हुई हो जैसे दुर्घटना, हत्या इत्यादि।
  • एकादशी व द्वादशी श्राद्ध(2324 सितंबर)- यह तिथि परिवार के उन परिजनों के लिए श्राद्ध करने की उतम तिथि है जिन्होंने सन्यास लिया हो या सन्यासी का जीवन व्यतीत किया हो  यह इस तिथि श्राद्ध का विधान है।
  • नवमी श्राद्ध(21 सितंबर, बुधवार)- यह के नाम से ज्ञात इस श्राद्ध मे कुल की महिलाओं का श्राद करना उतम माना गया है इस दिन श्राद्ध करने से कुल की सभी महिलाओं को  समस्त रूप से  पूजा जा सकता है यह तिथि माँ के श्राद्ध के लिए सर्वोच्च है।
  • पंचमी श्राद्ध(17 सितंबर, शनिवार)- कुंवारा पंचमी के नाम से ज्ञात इस श्राद्ध मैं उन परिजनों का श्राद्ध करना उतम है जिनकी मृत्यु विवाह से पूर्व हुई हो।

आश्विन कृष्ण प्रतिपदा श्राद्ध(13 सितंबर, मंगलवार)- इस तिथि पर नाना नानी का श्राद्ध करना उतम माना गया है। यदि नाना-नानी के परिवार में कोई श्राद्ध करने वाला न हो और उनकी मृत्युतिथि भी ज्ञात न हो तो इस तिथि को श्राद्ध करने से उनकी आत्मा तृप्त होती है। और इससे घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

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