» Ramzan a Training Camp (रमज़ान एक प्रशिक्षण शिविर)

Ramzan a Training Camp (रमज़ान एक प्रशिक्षण शिविर)

Posted On: 09 Jul, 2013| Festival: Ramzan (Roza)

ईश्‍वर की भक्ति में लीन होकर मनुष्‍य उसके प्रति अपने समर्पण को व्‍यक्‍त करने के लिए सदैव से तप और उपवास करता आ रहा है। यही कारण है कि समस्‍त धर्मों में भक्ति का यह रूप पाया जाता है कि मनुष्‍य कुछ समय के लिए खान-पान से स्‍वयं को अलग करके अपने आपको उसकी उपासना में लीन कर देता है। ईसाई हो या यहूदी, हिन्‍दू हो या पारसी, समस्‍त धर्मों में यह प्रथा पाई जाती है।

ईश्‍वर ने जब इस्‍लाम को समस्‍त मानव जाति के लिए मार्गदर्शन बनाकर अपने अंतिम ईशदूत हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍ल) के माध्‍यम से कुरआन के रूप में भेजा, तो उसने मुसलमानों को इस सत्‍य से अवगत भी कराया कि तुमसे पूर्व के लोगों पर भी रोजे़ अनिवार्य किए गए थे।

'ऐ लोगों जो ईमान लाए हो, तुम्‍हारे लिए रोजे़ अनिवार्य कर दिए, जिस तरह तुमसे पहले नबियों के अनुयायियों के लिए अनिवार्य किए गए थे। इससे उम्‍मीद है कि तुममें तक़वा पैदा होगा।'

अनिवार्यता का उद्देश्‍य :- रोज़ों के अनिवार्य किए जाने का उद्देश्‍य 'तकवा' की प्रवृत्ति को पैदा करना है। तक़वा से तात्‍पर्य है बुराइयों से बचना। जो लोग एकेश्‍वरवाद को स्‍वीकार कर स्‍वयं को उसी एक शक्तिशाली ईश्‍वर के समक्ष समर्पित करना चाहते हैं, उनसे आशा की जाती है कि वे स्‍वयं भी बुराइयों से बचें और समाज में फैली हुई बुराइयों को मिटाने का भरसक प्रयत्‍न करें, चाहे समाज उसका कितना ही विरोध करें।

रमज़ान एक प्रशिक्षण शिविर :- लोगों के विचार एवं व्‍यवहार में यह परिवर्तन इतना सरल न था, अत: ईश्‍वर ने यह आवश्‍यक समझा कि लोगों के अंदर इस प्रवृत्ति को उत्‍पन्‍न करने के लिए उन्‍हें प्रतिवर्ष पूरे एक माह का प्रशिक्षण दिया जाए। उसने अपने सर्वव्‍यापी ज्ञान के आधार पर प्रशिक्षण के लिए उस माह को चुना, जिसमें क़ुरआन का अवतरण हुआ था और वह था रमज़ान का महीना।

'रमज़ान वह महीना है जिसमें क़ुरआन उतारा गया जो इंसानों के लिए सर्वथा मार्गदर्शन है और ऐसी स्‍पष्‍ट शिक्षाओं पर आधारित है जो सीधा मार्ग दिखाने वाली और सत्‍य और असत्‍य का अंतर खोलकर रख देने वाली है। अत: अब से जो व्‍यक्ति इस महीने को पाए उसके लिए अनिवार्य है कि इस पूरे महीने के रोजे रखे...।''

प्रशिक्षण कैसे :- इस पवित्र महीने के लिए ईश्‍वर ने एक माह का एक ऐसा कार्यक्रम गठित कर दिया है, जिसके पूरा करने में एक व्‍यक्ति को काफी प्रयत्‍न करना पड़ता है।

(1) पूरे महीने प्रतिदिन प्रात: सूर्योदय से (पौ फटने से) पहले उठना और कुछ भोजन ग्रहण करना।

(2) प्रतिदिन सूर्योदय से सूर्यास्‍त तक खानपान और अपनी समस्‍त इंद्रियों को अपने वश में रखना। इस अवधि में जल, फल अन्‍न एवं हर प्रकार के खाने-पीने की वस्‍तुओं का प्रयोग करना मना है। इसी को इस्‍लाम में रोज़ा कहा जाता है।

(3) सूर्योदय के पूर्व सामूहिक रूप से ईश्‍वर के समक्ष उपस्थित होकर उसके द्वारा बताए गए नियम व पद्धति के अनुसार उसकी उपासना (नमाज पढ़ना) करना।

(4) इसी 'रोज़े' की अवस्‍था में अपनी समस्‍त दिनचर्या को पूरा करना। इस्‍लाम की शिक्षा यह नहीं है कि ईश्‍वर की उपासना सामाजिक एवं पारिवारिक दायित्‍व का त्‍याग कर ही संभव है। इस्‍लाम के अनुसार तो इस दायित्‍व की पूर्ति के लिए भरपूर प्रयत्‍न करना भी ईश्‍वर की उपासना का एक अंग है।

(5) सूर्यास्‍त के समय रोज़े की अवधि समाप्‍त होते ही, सामूहिक रूप से जलपान ग्रहण करना (इफतार करना) रोज़े की अवधि समाप्‍त होने के बाद भी जलपान ग्रहण न करना अनुशासनहीनता है।

(6) फिर तत्‍काल सामूहिक रूप से ईश्‍वर के समक्ष उपस्थित होकर नम़ाज में लीन हो जाना, जिसे मग़रिब की नमाज़ कहते हैं।

(7) उसके कुछ ही घंटे बाद रात्रि की नमाज (इशा की नमाज़) के लिए फिर उपस्थित हो जाना। इशा की नमाज़ के बाद तरावीह की नमाज पढ़ी जाती है, जिसमें प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा करके एक माह में पूरा पवित्र क़ुरआन पढ़ा जाता है।

(8) इसके बाद रात्रि में सोने की अनुमति है, परंतु ईशदूत हज़रत मुहम्‍मद (सल्‍ल.) ने हमें प्रेरणा दी है कि हम मध्‍य रात्रि या उसके कुछ समय बाद उठकर एकांत में अपने ईश्‍वर के समक्ष तहज्‍जुद की नमाज़ में खड़े होकर उसके प्रति अपने समर्पण को व्‍यक्‍त करें।

(9) इस अतिव्‍यस्‍त कार्यक्रम में पांचों नम़ाजों को उनके समय पर पूरा करना है और यदि संभव हो तो पूरे महीने में एक बार कुरआन का अध्‍ययन भी कर लें।

(10) इस अति व्‍यस्‍त एवं कठिन कार्यक्रम में यह भी सम्मिलित है कि अपने पूरे वर्ष की आय एवं समस्‍त संपत्ति पर ज़कात भी निकाली जाए। इसकी मात्रा ईश्‍वर ने ही सुनिश्चित की है।

रमज़ान के इस महीने में ईश्‍वर हमसे यह भी अपेक्षा करता है कि पूरा समय उनके बनाए हुए नियमों का पालन करेंगे और उनकी अवहेलना (अनादर) से बचने का भरसक प्रयत्‍न करेंगे और यदि समय के साथ इसमें सुस्‍ती आती है, तो अगला रमज़ान हमारे अंदर नई शक्ति का संचालन कर हमें फिर तक़वा पर जमा करेगा।

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